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कोविड के दौर में छात्रों को चिड़चिड़ापन, बेचैनी व घबराहट से बचाने की पहल

नई दिल्ली, 20 दिसंबर | कोरोना महामारी पूरे विश्व समुदाय के लिए एक चुनौतीपूर्ण समय है। शिक्षा के क्षेत्र में जहां एक तरफ छात्र-छात्राएं दूरस्थ शिक्षा के ‘फिर से सामान्य’ का पालन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनमें चिड़चिड़ापन, बेचैनी और घबराहट भी बढ़ गई है। ऐसे में खास तौर पर किशोरावस्था के छात्रों को मानसिक तौर पर तनाव मुक्त बनाए रखने के लिए शिक्षा मंत्रालय प्रयास कर रहा है। छात्रों को मानसिक तनाव से उबरने के लिए शिक्षा मंत्रालय ने कोविड-19 के दौरान और उसके बाद छात्रों, शिक्षकों और उनके परिवारों के लिए मनोवैज्ञानिक एवं अन्य मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों द्वारा संपर्क परामर्श एवं मार्गदर्शन के लिए इंटरएक्टिव ऑनलाइन चैट प्लेटफॉर्म भी शुरू किए हैं।

शिक्षा मंत्रालय ने मनोदर्पण नामक एक पहल भी की है। इसमें कोविड महामारी के दौरान और उसके बाद छात्रों शिक्षकों और उनके परिवारों के मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक कल्याण के लिए मनोवैज्ञानिक सहायता दी जा रही है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने छात्रों के लिए शुरू गई विभिन्न योजनाओं जैसे निष्ठा व मनोदर्पण के बारे में बताते हुए कहा, “इन उद्देश्यों को मनोदर्पण पहल के विस्तार के रूप में शामिल किया है। यह पूरे भारत में छात्रों, शिक्षकों और परिवारों को मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करने में प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत अभियान का एक हिस्सा है। यह सामाजिक-भावनात्मक भलाई के तत्वों से भी जुड़ा हुआ है जैसा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में भी निहित है।”

इसके अलावा भिन्न-भिन्न योजनाओं जैसे ‘डिजिटल इंडिया’, ‘फिट इंडिया’ और ‘स्किल इंडिया’ के द्वारा भी छात्रों को यथोचित सहायता दी जा रही है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने कहा, “किशोरावस्था एक ऐसा समय होता है, जब हमारे बच्चे यह समझना शुरू करते हैं कि वह कौन है और क्या बनना चाहते हैं। बच्चे कुछ कर दिखाने के जुनून के साथ अपनी एक पहचान बनाने का प्रयास करते हैं। किशोरावस्था में करियर के विकल्प ढूंढना, सार्थक संबंध बनाने और बनाए रखने के लिए प्रयास, तकनीकी विकास के साथ आगे बढ़ने का कौशल व व्यवहार जैसी अन्य चीजें विकसित होती हैं। इसलिए एक राष्ट्र के रूप में उनकी राय और सिफारिशों को सुनना और समझना हमारा कर्तव्य है।”

उन्होंने आगे कहा कि किशोरों के लिए यह आवश्यक है कि वह 21वीं सदी के कौशल को विकसित करें, जिसमें तीन मुख्य कौशल शामिल हों। शिक्षण कौशल यानी नए ज्ञान के अधिग्रहण करने के लिए आवश्यक कौशल, जीवन कौशल यानि रोजमर्रा की जिंदगी को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक कौशल व साक्षरता कौशल यानी जो पढ़ने, मीडिया और डिजिटल संसाधनों के नए ज्ञान को बनाने और प्राप्त करने में मदद करता है।

उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय किशोर सम्मेलन भी लैंगिक संवेदनशीलता, पारिवारिक संबंध और संचार, मीडिया साक्षरता जैसे अन्य किशोर संबंधी समझ को सुविधाजनक बनाने का प्रयास करेगा।”

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में किशोरों के लिए दिए गए प्रावधानों के बारे में निशंक ने कहा, “यह शिक्षा नीति कैपिसिटी बिल्डिंग पर फोकस करती है। कैपिसिटी बिल्डिंग से नेशन बिल्डिंग का फार्मूला ही है जो हमें सशक्त बनाएगा। चाहे छात्रों की कैपिसिटी बिल्डिंग हो या फिर शिक्षकों की या फिर संस्थानों की सभी का साथ लिए बिना व सभी को विस्तार दिए बिना नेशन बिल्डिंग का काम संभव नहीं है।”

डॉ. निशंक ने कहा, “मुझे पूरा विश्वास है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक तथा कच्छ से अरुणाचल तक सभी छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी। देश का हर छात्र शिक्षित मानव संपदा के रूप में एक ताकत बनकर आत्मनिर्भर, शिक्षित और सशक्त भारत के निर्माण में एक निर्णायक भूमिका निभाएगा। इसके अलावा मुझे यह भी विश्वास है सभी के सहयोग, समन्वय, सहभागिता और नेतृत्व से हम शिक्षा नीति का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन कर पाएंगे और भारत एक वैश्विक ज्ञान की महाशक्ति के रूप में उभरेगा।”

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